विपश्यना का 10 दिन का शिविर: दिन-प्रतिदिन क्या होता है
गोयनका परंपरा के 10 दिन के विपश्यना शिविर में क्या होता है: आचार संहिता, सुबह 4 बजे से रात 9:30 तक की समय-सारणी, हर दिन का क्रम और दान।
Vipassana Nepal team · · 9 min read

गोयनका परंपरा का 10 दिन का विपश्यना शिविर एक आवासीय शिविर है, जिसमें साधक पूरे समय मौन रहकर रोज़ क़रीब 10 घंटे ध्यान करते हैं। पहले तीन दिन साँस पर ध्यान होता है, चौथे दिन विपश्यना दी जाती है और दसवें दिन मैत्री; आने और जाने के दिन जोड़कर शिविर कुल 12 दिन का होता है।
यह लेख शिविर का ब्योरा देता है, विधि नहीं सिखाता: विधि शिविर में आचार्य से ही सीखी जाती है। नियम और समय वही हैं जो सितंबर 2026 में dhamma.org पर प्रकाशित थे; अपने केंद्र की स्थानीय बातें वहीं से पक्की कर लें।
10 दिन ही क्यों?
dhamma.org के अनुसार परंपरागत रूप से विपश्यना सात हफ़्ते के शिविरों में सिखाई जाती थी। शिक्षकों ने कम अवधि भी आज़माई और पाया कि मन के शांत होकर गहराई से काम करने के लिए 10 दिन से कम समय काफ़ी नहीं है। इसलिए 10 दिन को न्यूनतम अवधि माना जाता है।
निर्देश और शाम के प्रवचन एस. एन. गोयनका की रिकॉर्डिंग हैं; शिविर सहायक आचार्य चलाते हैं और सवालों के जवाब देते हैं। आचार संहिता (Code of Discipline) कहती है कि शिविर न अंधश्रद्धा पर टिका कोई कर्मकांड है, न आराम या छुट्टी का मौक़ा, और न किसी बीमारी का इलाज।
पहुँचने का दिन (दिन 0)
dhamma.org की शब्दावली के अनुसार 10 दिन के शिविर दोपहर 2 से 4 बजे के पंजीकरण और एक परिचय सत्र के बाद शुरू होते हैं। फ़ोन, स्मार्टवॉच और दूसरे उपकरण शिविर ख़त्म होने तक व्यवस्थापकों के पास जमा रहते हैं। कुछ केंद्रों का तरीक़ा अलग है: काठमांडू के धम्म शृंग में पंजीकरण शहर के दफ़्तर में होता है और वहाँ से साधक किराये की बस से केंद्र जाते हैं।
उसी शाम शिविर औपचारिक रूप से शुरू होता है। साधक बुद्ध, धम्म और संघ की शरण लेते हैं, शील ग्रहण करते हैं, शिविर भर के लिए आचार्य का मार्गदर्शन स्वीकार करते हैं और पहला अभ्यास, आनापान, सिखाने का निवेदन करते हैं। Vipassana Research Institute (VRI) के प्रकाशित प्रवचन सार के अनुसार गोयनका दसवें दिन के प्रवचन में कहते हैं कि शरण लेने का मतलब एक संगठित धर्म छोड़कर दूसरा अपनाना नहीं है। आर्य मौन शिविर के साथ ही शुरू हो जाता है।
आचार संहिता: मुख्य नियम सरल शब्दों में
आवेदन से पहले आचार संहिता पढ़नी होती है, और आवेदन तभी करना चाहिए जब उसका ईमानदारी से पालन कर सकें। संहिता के अनुसार दस दिन का समय कम है, और एकांत में लगातार अभ्यास से ही विधि काम करती है। उसका सार एक वाक्य में है: ऐसे ध्यान करें मानो आप अकेले हों।
पाँच शील, और पुराने साधकों के लिए आठ
हर साधक पाँच शील का पालन करता है: किसी प्राणी की हत्या नहीं, चोरी नहीं, किसी भी तरह की यौन क्रिया नहीं, झूठ नहीं और कोई नशा नहीं। पुराने साधक (जो गोयनका या उनके किसी सहायक आचार्य के साथ शिविर कर चुके हैं) तीन शील और रखते हैं: दोपहर के बाद भोजन नहीं, मनोरंजन और शृंगार नहीं, और ऊँचे या आलीशान बिस्तर नहीं। इसलिए शाम 5 बजे पुराने साधक सिर्फ़ नींबू पानी या बिना दूध की चाय लेते हैं, जबकि नए साधकों को दूध वाली चाय और फल मिलते हैं। स्वास्थ्य के कारण आचार्य किसी पुराने साधक को छूट दे सकते हैं।
संहिता शील (sīla) को अभ्यास की नींव कहती है: शील से समाधि (samādhi) को सहारा मिलता है, और प्रज्ञा (paññā) से मन शुद्ध होता है। इन तीनों पर The three trainings (अंग्रेज़ी में) देखें।
आर्य मौन
आर्य मौन का मतलब है शरीर, वाणी और मन का मौन। साधक आपस में बात नहीं करते, और इशारे, सांकेतिक भाषा या लिखी पर्ची से भी संवाद नहीं करते। आचार्य और व्यवस्थापकों से बात की जा सकती है। स्त्री और पुरुष पूरी तरह अलग रहते हैं। पति-पत्नी, दोस्त या रिश्तेदार भी आपस में संपर्क नहीं रखते, और साधकों के बीच कोई शारीरिक स्पर्श नहीं होता।
दूसरे अभ्यास बंद
दस दिन पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान, मंत्र, माला और धूप-अगरबत्ती बंद रहते हैं, और दूसरी ध्यान विधियाँ, उपचार पद्धतियाँ और व्यायाम भी। विश्राम के समय तय जगह में टहला जा सकता है। संहिता के अनुसार यह दूसरी विधियों की निंदा के लिए नहीं, बल्कि विपश्यना को उसके शुद्ध रूप में आज़माने का सही मौक़ा देने के लिए है। धार्मिक वस्तुएँ और ताबीज़ घर पर छोड़ें या व्यवस्थापकों के पास जमा करें।
शिविर की सीमा के भीतर
साधक शिविर की सीमा के भीतर ही रहते हैं। पढ़ना, लिखना, संगीत और समाचार, कुछ नहीं; संहिता के अनुसार पढ़ने-लिखने की मनाही इसलिए है कि यह ध्यान व्यावहारिक है। कपड़े सादे और शालीन हों, ताकि दूसरों का ध्यान न भटके। भोजन शाकाहारी होता है, उपवास की अनुमति नहीं है, और धूम्रपान, वेपिंग या तंबाकू चबाना मना है।
रोज़ की समय-सारणी
आचार संहिता में यह समय-सारणी दी गई है। संहिता के अनुसार इसे अभ्यास की निरंतरता बनाए रखने के लिए बनाया गया है।
| समय | क्या होता है |
|---|---|
| सुबह 4:00 | उठने की घंटी |
| सुबह 4:30–6:30 | हॉल में या अपने कमरे में ध्यान |
| सुबह 6:30–8:00 | नाश्ता और विश्राम |
| सुबह 8:00–9:00 | हॉल में सामूहिक ध्यान |
| सुबह 9:00–11:00 | आचार्य के निर्देश के अनुसार हॉल में या अपने कमरे में ध्यान |
| सुबह 11:00 से दोपहर 12:00 | दोपहर का भोजन और विश्राम |
| दोपहर 12:00–1:00 | विश्राम (और आचार्य से मुलाक़ात) |
| दोपहर 1:00–2:30 | हॉल में या अपने कमरे में ध्यान |
| दोपहर 2:30–3:30 | हॉल में सामूहिक ध्यान |
| दोपहर 3:30 से शाम 5:00 | आचार्य के निर्देश के अनुसार हॉल में या अपने कमरे में ध्यान |
| शाम 5:00–6:00 | चाय और विश्राम |
| शाम 6:00–7:00 | हॉल में सामूहिक ध्यान |
| शाम 7:00 से रात 8:15 | हॉल में आचार्य का प्रवचन |
| रात 8:15–9:00 | हॉल में सामूहिक ध्यान |
| रात 9:00–9:30 | हॉल में प्रश्न पूछने का समय |
| रात 9:30 | अपने कमरे में विश्राम; बत्तियाँ बंद |
dhamma.org के हिसाब से दिन में क़रीब 10 घंटे ध्यान होता है। आचार्य दोपहर 12 से 1 बजे के बीच साधकों से अलग-अलग मिलते हैं और रात 9 से 9:30 बजे हॉल में सवालों के जवाब देते हैं। दोनों समय विधि और शाम के प्रवचन को समझने के लिए हैं।
दिन-प्रतिदिन क्या होता है
नीचे का ब्योरा बताता है कि किस दिन क्या सिखाया जाता है। निर्देश केवल शिविर में दिए जाते हैं।
दिन 1 से 3: आनापान
पहले तीन दिन ānāpāna का अभ्यास होता है। dhamma.org इसे नाक से भीतर आती और बाहर जाती प्राकृतिक साँस पर ध्यान टिकाना बताता है, ताकि मन शांत और एकाग्र हो। VRI के सार के अनुसार गोयनका पहले दिन के प्रवचन में कहते हैं कि पहला दिन कठिनाइयों से भरा होता है, कुछ इसलिए भी कि साधकों को दिन भर बैठने की आदत नहीं होती। परिचय के लिए Anapana (अंग्रेज़ी में) देखें।
दिन 4: विपश्यना दी जाती है
dhamma.org के अनुसार चौथे दिन तक मन विपश्यना के लिए तैयार हो जाता है: पूरे शरीर की संवेदनाओं को देखना, उनके स्वभाव को समझना और उन पर प्रतिक्रिया न करना सीखकर समता विकसित करना। पुराने साधकों के स्व-शिविर (self-course) के लिए dhamma.org की गाइड यह बदलाव चौथे दिन दोपहर में रखती है; आचार्य वाले शिविरों के लिए कोई निश्चित समय प्रकाशित नहीं है। निर्देश केवल शिविर में मिलते हैं; विधि की रूपरेखा Body scanning (अंग्रेज़ी में) में है।
अधिष्ठान की बैठकें
इसके बाद दिन की तीनों सामूहिक बैठकें अधिष्ठान (adhiṭṭhāna), यानी दृढ़ संकल्प की बैठकें होती हैं: साधक पूरे घंटे आसन न बदलने की कोशिश करते हैं। dhamma.org की गाइड कहती है कि अगर बहुत तकलीफ़ हो तो जितना कम हो सके उतना हिलें और बिना हार माने अभ्यास जारी रखें। अगर ऐसी बैठक से कोई शारीरिक कमज़ोरी या चोट बढ़ सकती हो, तो इसे न आज़माएँ।
दिन 5 से 9
समय-सारणी वही रहती है। VRI के प्रवचन सार के अनुसार शाम के प्रवचन उन अनुभवों पर बात करते हैं जिनसे साधक रास्ते में गुज़रते हैं: पाँचवें दिन दर्द, छठे दिन तृष्णा, द्वेष, आलस्य, बेचैनी और संदेह जैसी बाधाएँ (nīvaraṇa), और सातवें दिन ठीक से नींद न आना।
दिन 10: मैत्री, और फिर से बोलना
आख़िरी पूरे दिन साधक mettā सीखते हैं, जिसे dhamma.org सबके प्रति मैत्री या सद्भावना का ध्यान कहता है। उसी सुबह आर्य मौन ख़त्म होता है। dhamma.org के अनुसार बोलना इसलिए फिर शुरू किया जाता है ताकि रोज़मर्रा के जीवन का सामान्य ढंग लौट आए।
दिन 11: विदाई
ग्यारहवें दिन सुबह शिविर समाप्त होता है, dhamma.org की शब्दावली के अनुसार सुबह 7:30 बजे तक।
शाम के प्रवचन
हर शाम 7:00 से 8:15 बजे तक साधक गोयनका का रिकॉर्ड किया हुआ प्रवचन देखते हैं, जो dhamma.org के अनुसार दिन के अनुभव को समझने का संदर्भ देता है। प्रवचन हिंदी या अंग्रेज़ी में हैं और कई भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध है। दो भाषाओं वाले शिविर में दोनों समूह प्रवचन अलग-अलग सुनते हैं।
क्या शिविर बीच में छोड़ सकते हैं?
साधक पूरे शिविर में रहने का वचन देते हैं। dhamma.org के सवाल-जवाब में "क्या अंत तक रुकना ज़रूरी है?" का उत्तर "हाँ" है। VRI के सार के अनुसार गोयनका पहले दिन के प्रवचन में यह बात अंग्रेज़ी में इन शब्दों में कहते हैं:
"You are performing an operation on your mind; remain in the operating room."
(हिंदी में भावार्थ: आप अपने मन का ऑपरेशन कर रहे हैं, ऑपरेशन थिएटर में बने रहिए।) वे यह भी कहते हैं कि बीच में छोड़ना नुक़सानदेह हो सकता है, और कुछ कठिनाई अपेक्षित है: अचेतन में दबे विकार मानसिक या शारीरिक बेचैनी के रूप में ऊपर आ सकते हैं। संहिता कहती है कि मन में संदेह उठे तो तुरंत आचार्य से बात करें।
इसलिए आवेदन उन्हीं तारीख़ों के लिए करें जब पूरे 12 दिन दे सकें। साथ ही, dhamma.org के सवाल-जवाब के अनुसार शिविर के आचार्य और स्वयंसेवक डॉक्टर, मनोवैज्ञानिक या काउंसलर नहीं हैं। कोई अनुभव डराने लगे या ठीक न हो, तो आचार्य या व्यवस्थापकों को तुरंत बताएँ; स्वास्थ्य की समस्या के लिए डॉक्टर की मदद चाहिए। गहन ध्यान में होने वाले कठिन अनुभवों पर शोध विपश्यना के फ़ायदे: शोध क्या कहता है (और क्या नहीं) में है।
शिविर का ख़र्च कौन उठाता है?
शिक्षा, भोजन और रहने का कोई शुल्क नहीं है। इस परंपरा के शिविर केवल दान (dāna) से चलते हैं, और दान सिर्फ़ उन्हीं से लिया जाता है जो कम से कम एक 10 दिन का शिविर पूरा कर चुके हैं। पहली बार आया साधक शिविर के अंत में दान दे सकता है।
संहिता सुझाती है कि दान इस भाव से दिया जाए कि मेरा शिविर पहले के साधकों की उदारता से चला, अब मैं आगे के किसी शिविर में योगदान दूँ ताकि दूसरों को भी लाभ मिले। कोई रक़म सुझाई नहीं जाती; हर कोई अपनी क्षमता और इच्छा से देता है। न आचार्यों को वेतन मिलता है, न व्यवस्थापकों को, और dhamma.org के अनुसार आचार्यों को अपनी आजीविका का साधन ख़ुद रखना होता है। दूसरी परंपराओं के शुल्क से तुलना Is Vipassana free? (अंग्रेज़ी में) में है।
आगे क्या पढ़ें
आवेदन, तैयारी और भारत के केंद्रों की जानकारी विपश्यना शिविर में कैसे जाएँ: आवेदन, तैयारी और भारत के केंद्र में है। दूसरी परंपराओं के शिविर कैसे चलते हैं, यह The Vipassana 10-day course, day by day (अंग्रेज़ी में) में है।
Sources
- Introduction to the Technique and Code of Discipline, dhamma.org
- Questions & Answers About the Technique of Vipassana Meditation, dhamma.org
- Vipassana Meditation, dhamma.org
- Course Glossary, dhamma.org
- Self-Course FAQs, dhamma.org
- The Discourse Summaries (S. N. Goenka, condensed by William Hart), Vipassana Research Institute
- Center Information: Dhamma Shringa, Nepal Vipassana Center


